बेचारा रामलाल!

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                    छोटे से शहर का छोटा सा मोहल्ला ऐसी ज़गहों पर तो ख़बर आग की तरह फैलती है; बस फैल गयी। सिपाही रामलाल की लड़की किसी दूसरी जात के लड़के के साथ भाग गई। जिसने सुना वो सब काम छोड़कर दूसरे को सुनाने चल पड़ा। ज़रूरी से ज़रूरी काम इतना ज़रूरी नहीं रह गया जितना कि इस ख़बर को लोगों तक पहुंचाना ज़रूरी था। वैसे भी किसी की लड़की के भाग जाने की ख़बर दूसरों को सुनाने में जो रस मिलता है उसका तो क्या कहना!। जितने मुंह उतनी बातें; लोगों ने कहा लड़की का चाल चलन शुरू से ही ठीक नहीं था। ये बात भी पता चली कि लड़की का एक चक्कर पहले भी चल चुका है जिसे रामलाल ने पुलिसिया अंदाज़ में खत्म करवाया था। एक बात की दबी हुई खुशी भी सबको थी कि रामलाल की नाक कट गयी। जब देखो तब पुलिस का रौब झाड़ता रहता है। वैसे है तो सिपाही लेकिन खुद को इंस्पेक्टर से कम नहीं समझता। अब सब हेकड़ी निकल जाएगी जब पूरा का पूरा शहर थू-थू करेगा। और रामलाल! वो तो इंसपेक्टर के चरणों में बैठकर जार-जार आंसू बहा रहा था। थाने का पूरा  स्टाफ भी  वहीं था; एक पुलिस वाले की लड़की के भागने का मतलब है पूरे पुलिस डिपार्टमेंट की इज्जत का सत्यानाश । इंस्पेक्टर ने पूछा ‘‘ रामलाल! कुछ तो पता होगा कि लड़की कहां गयी है?’’‘‘ हां सर! मैंने पता लगा लिया है; अभी दोनों भोपाल में हैं।’’ 

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तो फिर परेशानी  की क्या बात है; मैं अभी बात कर लेता हूँ शाम तक तो लड़की घर वापस आ जायेगी।’’ इंस्पेक्टर ने सांत्वना देने के अंदाज़ में कहा तो रामलाल फूट-फूट कर रोने लगा ‘‘ अब कुछ नहीं हो सकता। हरामजादी पूरी तैयारी के साथ गयी है; पता चला है कि शादी तो दोनों ने एक महीना पहले ही भोपाल कोर्ट में कर ली थी। और अभी दोनों आइ. जी. साहब को आवेदन दे आएं हैं कि हमारी जान को खतरा है। कुछ हरामी मीडिया वाले भी अपनी रोटियां सेकने में लगे हैं। अगर कुछ किया तो पूरा देश मेरा तमाशा  देखेगा। अब आप ही बताओ मैं क्या करूं?’’ इंस्पेक्टर ने  मामले के हानि-लाभ जस-अपजस पर चिंतन किया और फरमान सुना दिया

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रामलाल! समझ लो तुम्हारी तीन नहीं बल्कि दो ही बेटियां हैं। जो भाग गयी समझ लो वो तुम्हारे लिए मर गयी।’’ पूरे थाने में सबने इंस्पेक्टर की हां में हां मिलायी और तय कर लिया गया कि इस मामले को यहीं दबा देना ठीक रहेगा। वैसे भी एक मामूली सिपाही की बेटी के लिए कौन सरदर्द मोल ले; एस.पी. साहब की बेटी भागती तो अलग बात होती। रामलाल कुछ देर तक तो सबकी बात सुनता रहा फिर इंस्पेक्टर साहब ने उसे दिन भर की छुट्टी दे दी। वो भी समझ रहे थे कि अभी रामलाल को अपने घर में भी बहुत कुछ करना होगा। रामलाल घर लौटा तो घर का वातावरण देखकर दंग रह गया। लगभग पूरा का पूरा मोहल्ला उसके घर पर एकत्रित था और उसकी पत्नी दहाड़े मार कर रो रही थी। रामलाल को देखते ही उसने पछाड़ खायी और चीख़कर बेहोश  हो गयी। रामलाल कुछ देर तक तो चुपचाप खड़ा रहा फिर वो भी ज़ोर से चीखा और बेहोश हो गया। पूरा का पूरा मोहल्ला सक्रिय हुआ और अचानक ही आलोचक समूह किसी पूर्ण कुषल सेवाभावी समूह में बदल गया। कोई पानी लाने दौड़ा तो कोई डॉक्टर  को बुलाने; दो-तीन लोग पंखा झालने में जुट गए। न केवल लोगों की भूमिका बदली वरन् सुर भी बदल गए। अब तक जो लोग रामलाल की आलोचना कर रहे थे वे सब उसकी भागी हुई बेटी को कोसने लगे। ‘‘ अरे साहब! ये आजकल की औलाद है ही ऐसी मां-बाप मरें या जिएं उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।’’ बस इस बात को सुनते ही पूरा का पूरा मां-बाप वर्ग एकजुट हो गया और सब के सब नयी पीढ़ी को दोषी  ठहराने में जुट गए। तभी एक सज्जन ने सूचना दी कि उन्होंने रामलाल को चूहा मार दवा खरीदते देखा है। तुरंत बेहोश रामलाल की तलाशी  ली गयी तो चूहा मार दवा की चार पुड़िया उनकी जे़ब से बरामद हुईं। बस फिर क्या था; हाहाकार मच गया। अरे!! ये भला आदमी तो परिवार सहित आत्महत्या करना चाहता है। मोहल्ले के जो लोग अब तक वहां नहीं पहुंचे थे ये बात सुनकर वो भी वहां आ गए। कुछ ही देर में डॉक्टर  भी आ गया। छोटे-मोटे इलाज़ के बाद रामलाल और उसकी पत्नी को होष आया तो सारा का सारा मोहल्ला उपदेषक हो गया। ‘‘ अरे भले आदमी! ऐसी लड़की के लिए तू जान देना चाहता जिसने एक बार भी तेरे बारे में नहीं सोचा। भूल जा जो कुछ हुआ। अब बस अपनी इन दो मासूम बेटियों के बारे में सोच और अपनी देवी जैसी पत्नी का ध्यान रख।’’ मोहल्ले के लोग दो-तीन घंटे तक रामलाल को समझाते रहे; जिसे जो भी ज्ञान की बात पता थी वो उसने सुनायी; जिसे इस तरह का कोई दूसरा प्रकरण पता था जिसमे मां-बाप ने बेटी के भागने के बाद बहुत हिम्मत दिखायी उसने वो सुनाया। मोहल्ले के लोग ही अपने घर से खाना लेकर आए और ज़बरदस्ती रामलाल के पूरे परिवार को खाना खिलाया। जब सब निश्चिन्त  हो गए की अब रामलाल कोई ग़लत कदम नहीं उठाएगा तो पूरा मोहल्ला अपने-अपने घरों को लौट गया। सबके मन में रामलाल के परिवार के लिए असीम सहानुभूति थी।

                                
रात होने पर रामलाल की पत्नी ने दोनों बेटियों को खाना खिलाकर सुला दिया और रामलाल के पास आकर बैठी तो रामलाल ने अपनी आवाज़ में मिठास घोलकर पूछा ‘‘ तुम बेहोश कैसे हो गयीं थीं? मुझे तो बहुत चिंता हो गयी थी।’’ 

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मैं भी क्या करती पूरे मोहल्ले में थू-थू हो रही थी। सब के सब कुत्तों के जैसे भौंक रहे थे। जब बेहोश हुई तब जाकर हरामियों को चैन पड़ा। और तुमने भी तो ग़जब कर दिया चूहा मार दवाई ही ले आए।’’ पत्नी की बात सुनकर रामलाल हंसा। ‘‘ वो तो मैं चूहे मारने के लिए लाया था। मुझे क्या पता था कि मोहल्ले का कोई आदमी मुझे देख रहा है लेकिन उसके कारण तो नाटक में जान आ गयी।’’ रामलाल की पत्नी भी हंसी ‘‘ चलो सब कुछ अच्छे से निपट गया बस अब एक महीने तक चेहरे पर मनहूसियत रखनी पड़ेगी ताकि किसी को शक  न हो।’’ रामलाल ने पत्नी की ओर मुस्करा कर देखा ‘‘ दोनों मजे में होंगे। मुझे तो तीन महीने पहले ही पता चल गया था कि दोनों भागने वाले हैं; फिर जब दोनों की शादी हुई तब भी मुझे ख़बर मिल गयी थी। लड़के के बारे में मैं सब कुछ पता कर ही चुका था। ऐसी शानदार नौकरी; दिखने में अपनी बिटिया से इक्कीस ही बैठेगा उस पर प्रतिष्ठित परिवार। सब कुछ देखकर मैंने तो तय कर लिया था कि बिटिया के भागने में ही अपनी भलाई है। नहीं तो मैं कोशिश  करता तो सात जनम में ऐसी जगह शादी  नहीं करवा पाता। पहले तो सोचा कि राजी खुशी घर से ही शादी  करवा दूं  फिर सोचा कि जब दोनों भाग ही रहे हैं तो मैं अपना प्रोविडेंट फण्ड क्यों बरबाद करूं। रही बात लोगों की; वो तो आज का ड्रामा ऐसा सटीक हुआ है कि सब के सब कल भी अपने घर से लाकर खाना खिलायेंगे।’’ रामलाल की बात सुनकर उसकी पत्नी के चेहरे पर भी गहरे संतोष के भाव आए। दोनो ने मिलकर भगवान जी के आगे शुद्ध घी का दीपक जलाया और प्रार्थना की ‘‘ हे भगवान् तू बड़ा कृपालु है जैसे हमारी बड़ी बिटिया का भला किया वैसे ही बाकी दोनों बेटियों का भी ध्यान रखना।’’ प्रार्थना करके दोनों सोने गए तो रामलाल के कहने पर उसकी पत्नी ने घर की सारी बत्तियां जलने दीं। मोहल्ले के कुछ अति जागरुक लोगों ने रात में दो बजे उठकर देखा कि रामलाल के घर की बत्तियां जल रहीं हैं तो सबकी आंखें भर आयीं। एक सज्जन बोले ‘‘शायद सब जाग रहे हैं ; क्या करे इज्जतदार आदमी ऐसी हालत में सो भी कैसे सकता है।’’ उनकी बात सुनकर सबने समवेत स्वर में कहा च् च् च्....... बेचारा रामलाल! 
                                       - अशोक  जमनानी

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